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नन्हे परिन्दे

छोटी- छोटी उड़ानों के अभ्यास लो अब पूर्ण हुए... अब नीड़ को छोड़ बहुत कुछ सीखने नन्हे परिन्दे सुदूर आकाश को चले... जनकों के सानिध्य तले बेफिक्र बचपन को गुज़ार लो आज अपने अपने मार्ग तलाशने नन्हे परिन्दे, व्यस्क हो अपने- अपने आकाश, छूने चले... अपने जनकों की प्रार्थनाओं में अपनी महत्वाकांक्षाओं को पिरो देखो परिन्दे नए आकाश नापने चले... उनकी उड़ानों से, आश्वस्त जनक उनके भविष्य से जुड़े नए- नए ख्वाब फिर से बुनने लगे... उनके भी नव नीड़ हो ऐसी कामना अनजाने में ही, करने लगे... अब स्वयं की शेष यात्रा पर, पुनः विचार कर स्वयं के लिए भी नवीन स्वप्न गढ़ने को जनक भी निकल पड़े... क्योंकि अब दीपक और कुछ नन्हे परिन्दे व्यस्क हो, नए आकाश की खोज में सुदूर उड़ानें भरने लगे...

जिन्दगी

बहुत संभाला है खुद को मगर संभल नहीं पाया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया अब रिश्तों से कोई ताल्लुक नहीं बस दौलत से नाता है सबसे बड़ा गुरु वक्त है मेरे दोस्तों वही सब कुछ सिखाता है बहुत अफ़सोस ऊँचाई पर बैठने वालों को कोई अपना नजर नहीं आया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया  हर किसी को शॉर्टकट चाहिए ईमानदारी की सड़क पर कोई चलना नहीं चाहता मंजिल तो मेहनत के दम पर मिलती है मगर मेहनत की आग में कोई जलना नहीं चाहता मैं भी मजबूर हूँ जो जिन्दगी के हर रंग कविता में उतार नहीं पाया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया दीपक तो अपने ही चहेतों का मन पढ़ नहीं पाया जिन्हें अपना समझता था उन्होंने ही सबसे ज्यादा रुलाया जो कहते थे कि हम हमेशा तेरे साथ हैं अच्छा हुआ जो मेरा  बुरा वक्त आने पर उन्होंने अपना असली रूप दिखाया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया किसी को गम की सुनामी ले डूबी तो कोई वक्त की आंधी में बह गया किसी को मयखाने में मिली पनाह तो कोई रास्ते का पत्थर बन रह गया यूँ तो लिखने वालों ने ब...