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नन्हे परिन्दे

छोटी- छोटी उड़ानों के अभ्यास लो अब पूर्ण हुए... अब नीड़ को छोड़ बहुत कुछ सीखने नन्हे परिन्दे सुदूर आकाश को चले... जनकों के सानिध्य तले बेफिक्र बचपन को गुज़ार लो आज अपने अपने मार्ग तलाशने नन्हे परिन्दे, व्यस्क हो अपने- अपने आकाश, छूने चले... अपने जनकों की प्रार्थनाओं में अपनी महत्वाकांक्षाओं को पिरो देखो परिन्दे नए आकाश नापने चले... उनकी उड़ानों से, आश्वस्त जनक उनके भविष्य से जुड़े नए- नए ख्वाब फिर से बुनने लगे... उनके भी नव नीड़ हो ऐसी कामना अनजाने में ही, करने लगे... अब स्वयं की शेष यात्रा पर, पुनः विचार कर स्वयं के लिए भी नवीन स्वप्न गढ़ने को जनक भी निकल पड़े... क्योंकि अब दीपक और कुछ नन्हे परिन्दे व्यस्क हो, नए आकाश की खोज में सुदूर उड़ानें भरने लगे...