जिन्दगी
बहुत संभाला है खुद को मगर संभल नहीं पाया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया अब रिश्तों से कोई ताल्लुक नहीं बस दौलत से नाता है सबसे बड़ा गुरु वक्त है मेरे दोस्तों वही सब कुछ सिखाता है बहुत अफ़सोस ऊँचाई पर बैठने वालों को कोई अपना नजर नहीं आया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया हर किसी को शॉर्टकट चाहिए ईमानदारी की सड़क पर कोई चलना नहीं चाहता मंजिल तो मेहनत के दम पर मिलती है मगर मेहनत की आग में कोई जलना नहीं चाहता मैं भी मजबूर हूँ जो जिन्दगी के हर रंग कविता में उतार नहीं पाया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया दीपक तो अपने ही चहेतों का मन पढ़ नहीं पाया जिन्हें अपना समझता था उन्होंने ही सबसे ज्यादा रुलाया जो कहते थे कि हम हमेशा तेरे साथ हैं अच्छा हुआ जो मेरा बुरा वक्त आने पर उन्होंने अपना असली रूप दिखाया जिन्दगी क्या है आखिर मैं समझ नहीं पाया किसी को गम की सुनामी ले डूबी तो कोई वक्त की आंधी में बह गया किसी को मयखाने में मिली पनाह तो कोई रास्ते का पत्थर बन रह गया यूँ तो लिखने वालों ने ब...